शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

व्यर्थ  है, कुछ बोलना, शब्दों को यूँ तौलना ,
चुन चुन कर घुन लगे अहसासों ,
को मरोड़ना,
बार बार फिर एक कोशिश, समझा पाऊं उसे,दिला पाऊॅ यकीं 
अस्तित्व विहीन हो चला, मेरे दर्प का अहसास,जब 
बात चली अपने होने की,
ढूँढने लगा खुद के,
दर्पण में ,
तो उसका चेहरा ही क्यूँ कर अा जाता सामने,
हज़ार बार खुदको झिडकने के बाद,
बारंबार अहसासों पर बिगड़ने के बाद,
अाज मैने जिद छोड दी,
अपने को पाने की मेरी हर कोशिश 
उस अहसास की नीयत छोड़ दी।
कैसे दिलाऊं उसको यकीं ,कैसे भरूँ अहसास वो,
मेरा अधूरे अकस को पूरा करने को आजा ।
मैं जी न पाया अाज तक,
शह पी न पाया आज तक।
मेरा अस्तित्व लौटा दे मुझे,
मेरा मुझमें होने के लिये आजा़ ,
मेरे बीते हुए वक़्त के रहनुमा,
मेरे रहते हुए लमहों को सजाने आजा।
व्यर्थ है,कुछ बोलना, शब्दों को यूँ तौलना
खो गए है, शब्द जो,
उनको जगाने आज अाजा।
आज आजा ।


भारती।

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