शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

व्यर्थ  है, कुछ बोलना, शब्दों को यूँ तौलना ,
चुन चुन कर घुन लगे अहसासों ,
को मरोड़ना,
बार बार फिर एक कोशिश, समझा पाऊं उसे,दिला पाऊॅ यकीं 
अस्तित्व विहीन हो चला, मेरे दर्प का अहसास,जब 
बात चली अपने होने की,
ढूँढने लगा खुद के,
दर्पण में ,
तो उसका चेहरा ही क्यूँ कर अा जाता सामने,
हज़ार बार खुदको झिडकने के बाद,
बारंबार अहसासों पर बिगड़ने के बाद,
अाज मैने जिद छोड दी,
अपने को पाने की मेरी हर कोशिश 
उस अहसास की नीयत छोड़ दी।
कैसे दिलाऊं उसको यकीं ,कैसे भरूँ अहसास वो,
मेरा अधूरे अकस को पूरा करने को आजा ।
मैं जी न पाया अाज तक,
शह पी न पाया आज तक।
मेरा अस्तित्व लौटा दे मुझे,
मेरा मुझमें होने के लिये आजा़ ,
मेरे बीते हुए वक़्त के रहनुमा,
मेरे रहते हुए लमहों को सजाने आजा।
व्यर्थ है,कुछ बोलना, शब्दों को यूँ तौलना
खो गए है, शब्द जो,
उनको जगाने आज अाजा।
आज आजा ।


भारती।

सोमवार, 3 सितंबर 2012


उज्जवल ,स्वर्णिम,मुक्त्त,किरण
जब जीवन की अंगडाई लेती है
नन्ही किरणों के धवल पंख,
जब रंगों के घेरे मैं बहते है,
मैं भी कुछ रंग चुराती हूँ,फिर,
जीवनपथ पर-
खो जाती हूँ।?
बार-बार
ये रंग मुझे -
मेरी परिभाषा कहते हैं ,अपने से लगने लगते हैं.

भारती 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

Kavita

मह। नगर की दौड़धूप में ,
पकते ज। रहे हैं संवेदन।अों से परे,
मस्तिष्क की ब।रीकियों में लगे,
य। कि ंपेट की तौलमौल से ढ़के,
हम हो ज।ते हैं अपने होने से परे,
करते रहते हैं शब्दों से खिलव।ड़,
कि कह प।एें हम भी कुछ,
जो घुट। ज। रह। है,शब्दों के विल।स की तह में,
अौर दब। रह। है अपनेपन की अ।हट को,
संवेदन।अों से िनरंतर खिलव।ड़,
अब कोई ड़।क। नहीं ड।लत। प्यार से अपनेपन क।,
म।नत। नहीं मन भी अब,
संवेदन।अों पर अब किसी क। अधिक।र नहीं,
झूठी लगती हैं,जब कोई जग।त। है ,गैर होकर
अपने पन क। अहस।स,
भड़क उठत। है मन,
कि फिर किस संवेदन। के पट।क्षेत्र की अ।हट है ये।

भ।रती,
13/8/2012





मंगलवार, 10 जनवरी 2012

vichaaro kaa makaa

कुछ दिमाग
की मेकनिस्म,
 कुछ शब्दों का खिलवाड़
रख दिए इस तरह से,
 जैसे रखता है एक बच्चा, बड़े सोच समाज के अपने मिटटी के घर की इंटो को
और बना दिया कोई सुन्दर सा संवाद . फिर खुश होना अपने खेलने के अहसास पर ,फिर जीत हुई आज शब्दों की, और एक इमारत खडी हुई विचारों की,
पर शब्दों के पंख कहा जो उड़ कर बैठते . खिड़की पर उन अहसासों की ,जो ता उम्र ना खोज
पाए शब्द अपने लिए,
क्योकि विचारो की उत्तजना ने बंद कर दिया,
 भावो की खिड़की और दरवाजे.फिर विजय हुई मश्तिषक की और दिल धरा का धरा रह गया.
कोई बोला सोचना छोड़
दे और समज्हना
सीख जा, क्योकि दिल के दरवाजे बंद है, आत्मा की चिड़िया उदास है, मगर
तू खुश रहना. विचारों का machanism  तो तेरे पास है. .
बना देना एक  और मका. घर ढूंढ ही लेगा जो आस पास है.

-----भारती





phir wohi baat

फिर अहसास वोही , फिर ख़याल वोही,
कुछ तो
उम्र का ऐतबार है. कुछ तो जुबा का सवाल है,
पर नाजुक से खयालो को किसका इंतज़ार है.
तबियत होती है जुदा इंसान बनते बनते
पर कब निकल जाए हसरतो का परिंदा यह अहसास नहीं,
वक़्त के मानिंद नहीं की हम बदल दे हर पल अपने होने की धुरी को
क्योकि
 कुछ  वो
 भी है जो निकल जाने का ऐतबार नहीं
कैसे पकड़ के रखे वो जो बंद मुट्ठी
 से निकलता है रेत की
 तरह, जहा उसके पहलू
 मे  होने का ऐतबार नहीं.
वो एक अहसास है निकल जाएगा फिजा के साथ,
अभी तो उसकी खुशबू
की नब्ज़ का अहसास नहीं
.ऐ पल ठहरजा कुछ इस तरह ,जो मेरे जीने का भरम तो हो लेने दे मुझे.
 अब तक  था ये जख्म यह भी विश्वास नहीं.

---भारती










बुधवार, 24 अगस्त 2011

उलज्हते.बिखरते,सम्हलते,मचलते,
भावों के ख्वाबो मे जलते ,
मन की मदिरा के दीप तले,
जीवन साँसों के ख्वाबो मे,
कोई तुमसा देख न पाए,
कोई तुमसा सोच न पाए!
अक्सर साँसों कीअंगडाई मे,
बिरहा की रुसवाई मे,
आसो की गहराई मे,
अपनी ही परछाई मे,
जब राग रंग फीके बन बैठे,
जीवन रस रीते बन बैठे,
अपनी आहट रास न आती ,
उन ख्वाबो को नींद न आती,
जो बुने हुए उनींदे चक्षुओ मे,
तो याद आता फिर एक ख़याल,
तुमारा कभी न डिगने वाला,
खूबसूरत जी का जंजाल 
बन पत्थर सहना हर वार ,
और बन जाना युगों को समर्पित ,
एक मूर्ति,एक मिसाल,
ढूंढनी न पड़ी मुझे कोई मशाल ,
क्योकि युग था समाहित संवेदना मे
मेरे गुरूर के उद्वीगता मे.
साँसों को था हाथ तुम्हारा ,
भावो को आधार तुम्हारा,
सृष्टि की संवेदना ,और तुम्हारा अपनापन.
मै मीलों चल आया प्रिये.
किन्तु
तुम
कहा हो अब ना सताओ ,जीवन रस के रंग मुझे अब भाते नहीं,
व्यग्रता के नाते जाते नहीं,
अश्रु भी अब आते नहीं,
मेरे समंदर मे समाने का समय अब आ गया है,
अस्तित्व कोबताने का समय अब आ गया है,
मै व्यग्र हू कि मुस्कुराने  का समय अब आ गया है.

-----भारती














































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रविवार, 17 अप्रैल 2011

8-KAVITA

खंड-खंड वह चिर्विमूढ़"
खंडित होता जाता था,
हाहाकार दिशाओं से फिर लौट लौट आ जाता था,
सन्नाटे फिर घेर रहे थे, वह निः श्वाश श्वाशो सा था,
उसने देखा फिर एक बार,
वह था या ना सा था!
----भारती